Privatization of public sector in india (भारत में सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण)

Privatization of public sector in india (भारत में सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण)

माध्यमिक स्कूलों को दिए जाने वाले अनुदान को कभी भी बंद कर सकती है सरकार

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निजीकरण को बढ़ावा देने में सरकार तेजी से बढ़ा रही है कदम और कभी भी माध्यमिक स्कूलों को दिए जाने वाले अनुदान पर रोक लगा सकती है जिससे सरकारी माध्यमिक विद्यालयों की हालत खस्ता हो जायेगी और स्कूलों का निजीकरण होना तय समझिये!

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फर्रुखाबाद 13 सितंबर 2023: मौजूदा सरकार निजीकरण के क्षेत्रों दिनों दिन आगे बढ़ती दिख रही है और हाल के ही दिनों में इसका नतीजा भी देखा गया है।

अगर माध्यमिक शिक्षक संघठन एक न हुए तो आने वाले दिनों में इसका भयंकर दुष्परिणाम भी नजर आने लगेगा और स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की स्थित दयनीय हो जायेगी। क्योंकि निश्चित ही सरकार का अगला कदम स्कूलों के निजीकरण में दिखने वाला है।

पहले से ही सुप्रीम कोर्ट यह निर्णय भी दे चुका है की कोई भी अनुदान देना सरकार के निर्णय के आधार पर टिका है इसमें कोर्ट भी कुछ नहीं कर सकता क्योंकि यह सरकार के विवेक के ऊपर निर्भर करता है।

अब तो लगभग हर जगह यह चर्चा भी प्रारम्भ हो चुकी है की आने वाले समय में सरकार शिक्षकों का वेतन ग्रांट भी वापस लेने जा रही है। वहीं शिक्षा विभाग के सूत्र बताते हैं कि DBT के माध्यम से ही अब सब कुछ किया जायेगा।

शिक्षकों को दिया जाने वाला वेतन सीधे छात्र/छात्राओं के अभिभावकों के खाते में भेजा जाय जिससे अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में नामांकन करा कर पढ़ाएंगे और इसका लाभ सीधे सरकार को अपने वोट बैंक के तहत होगा।

वैसे ही पिछले कुछ सालों से सरकार शिक्षा मित्रों के मामले को लेकर अड़ी हुई है। एक हजार से ज्यादा शिक्षा मित्रों की मौत के बाद भी सरकार तस से मस नहीं हो रही है।

अब ठीक वैसे ही माध्यमिक विद्यालयों में भी शिक्षकों की संख्या लगभग पूरे उत्तर प्रदेश में साठ हजार के आस पास है। जब की इन माध्यमिक स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक कुछ को छोड़कर बाकि दूर दराज से हैं।

कुल देखा जाय तो उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रों की संख्या लगभग एक लाख के आस पास थी। लेकिन इतनी बड़ी तादात में संख्या बल होने के बाद भी शिक्षा मित्रों को सहायक शिक्षक के पद से हटा दिया गया और उन्हें उनके मूल पद पर वापस भेज दिया गया।

जबकि शिक्षामित्रों की मूल नियुक्ति उनके नजदीक अथवा अपने ही गांव के विद्यालयों में हुई है। लेकिन जब सरकार ने उन्हें सहायक शिक्षक से वापस शिक्षा मित्र बनाया तो उनका आंदोलन शुरू हुआ लेकिन इस आंदोलन में उनका ठीक से किसी भी संघठन ने खुलकर सहयोग नहीं किया। और जब परीणाम सामने आया तो काफी निराशा हाथ लगी और उनका वेतन अधिनियम 1971 समाप्त हो चुका था।

क्योंकि उस समय सभी शैक्षिक संघठन एक दूसरे से बंटे हुए थे। फिर जोरदार आंदोलन की उम्मीद कैसे की जा सकती थी।

फिर दुबारा जब उन्होने आंदोलन शुरू किया तो खुद शिक्षा मित्र के सदस्य ही जिनकी संख्या मात्र 20 से 25 होती थी किसी भी धरने में तो यह कैसे वह सरकार से अपनी लड़ाई जारी रख पाते। जिसमें महिला शिक्षा मित्रों की संख्या तो न के बराबर होती जबकि पुरुषों की संख्या ठीक ठाक होती थी।

अब आप सोचेंगे कि सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे और इस सरकार को बदल दिया जायेगा लेकिन यह आपकी एक मात्र भ्रान्ति ही है और कुछ नहीं क्योंकि आपके ही बीच के आपके ही सहायक साथी जिनकी संख्या 50 प्रतिशत के आस पास है वही आपके साथ नहीं होंगे और किसी न किसी तरीके से वो सरकार का ही साथ दे रहें हैं।

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और सरकार यह भी जान रही है कि बाकी बचे 50 प्रतिशत में केवल 25 प्रतिशत ही सरकार के खिलाफ आंदोलन कर सकते हैं इस 25 प्रतिशत में भी 10 प्रतिशत तो महिलाएं होंगी जो कभी किसी आंदोलन में भाग ले ही नहीं सकतीं।

सम्भवत: बाकी का मामला सरकार कोर्ट में घसीट ले जायेगी आप कोर्ट के नतीजे से वाकिफ ही होंगे।

लेकिन फिर भी अगर सभी शिक्षक/कर्मचारी संघठन एक हो कर अपनी लड़ाई लड़े तो सरकार को झुकना पड़ सकता है। क्योंकि कि यह आपकी है और इस लड़ाई में शायद ही कोई राजनैतिक दल आपका साथ दे यहाँ तक आपका मुखिया अधिकारी भी नहीं।

इसलिए इस लड़ाई को जितने के लिए आपको स्वम ही आगे आना पड़ेगा वो भी अपनी नौकरी को ताक पर रखकर और प्राणों कि बाजी लगाकर इसलिए यह अत्यंत जरूरी है की सभी संघठन एक हो जाएं वरना आने वाला आपका भविष्य आपके बच्चों का भविष्य अत्यंत दुःखद होगा।