सरकारी डॉक्टर को किराये पर घर नहीं मिल रहा... जाति पूछ रहे लोग


दमोह में सरकारी डॉक्टर को घर नहीं मिल रहा है, कि वह पिछड़ी जाति की है। पांच दिन से परेशान हो रही है।



 डॉक्टर जान पहले तो आवभगत करते हैं, लेकिन जैसे ही सरनेम और जाति बताती है, टालमटोल करने लगते हैं। इंदौर की रहने वाली कोमल बावरी ने बताया कि 6 महीने पहले मेरी पोस्टिंग (डेटल विभाग) दमोह के जिला अस्पताल में हुई। पहले घर वसुंधरा नगर में मिला। सब ठीक चल रहा था, लेकिन मुझे कमरा खाली करना पड़ा। मकान मालिक के कुत्ते ने मुझे काट लिया था.. मैंने ऐतराज किया तो मुझसे झगड़ने लगे। धीरे-धीरे तनाव बढ़ गया तो घर छोड़ दिया। रिश्तेदार के यहां रहने चली गई।


जिला अस्पताल के आसपास ही मकान ढूंढ रही थी। विद्या नगर, विजय नगर, सुरेखा कॉलोनी में पूछने गई। पहले तो सभी 'बेटा- बेटा' करके बिठाते हैं, फिर बातों-बातों में सरनेम और जाति पूछते हैं। जैसे ही बताती हूं कि वाल्मीकि समाज से हूं, आनाकानी करने लगते हैं। कोई कहता है- कमरा खाली नहीं. कोई कहता है जनवरी-फरवरी तक दे पाएंगे! ये वे ही लोग हैं, जिन्होंने 'कमरा किराए से देना है' के बोर्ड लगा रखे हैं। कुछ जगह तो ऐसी भी थीं, जहां मेरे खान-पान को लेकर भी सवाल-जवाब हुए। बुंदेलखंड के इस इलाके में 6 महीने से हूं... यहां जातिवाद खूब है ! जाति और सरनेम पूछना आम है।


जो लोग अस्पताल आते हैं, उनसे भी अगर थोड़ी बातचीत हो जाए तो सीधा पूछ लेते हैं- 'कौन जात हो डॉक्टर साहब।' बर्ताव से निराश हूं। मां को फोन लगा कर खूब रोई कि हम बहनें पढ़-लिख कर अच्छी जगह तो पहुंच गए, लेकिन जाति और ऊंच-नीच के सवाल ने हमारा पीछा अब तक नहीं छोड़ा है।