हमारे अंदर में मुख्यत: तीन नकारात्मक तत्व मौजूद होते हैं



व्यक्ति कितनी ही बडी ऊंचाई तय कर ले, पर उसकी एक छोटी-सी कमी उसे मिनटों में जमीन पर ला देती है।


1 - क्रोध या संवेग, 2-- ईर्ष्या और 3-- बदले का भाव।


जब इनमें से एक भी हम पर हावी होता है, तो जिंदगी में भूचाल आ सकता है।


रामायण के पात्रों को करीब से जानें, तो यह बात और स्पष्ट हो जाती है।


क्रोध


लक्ष्मण ने गुस्से में शूपर्णखा की नाक काटकर राम-रावण संग्राम की भूमिका बना दी।


ईर्ष्या


ईर्ष्या ने कैकेयी को इतना मजबूर कर दिया कि अपने प्रिय पुत्र और पति को भी प्रताडित करने में संकोच नहीं हुआ।


बदले की भावना


इसी तरह, रावण जैसे महापंडित को बदले की आग ने बुराई का प्रतीक बना दिया।


 इन सभी पात्रों के अंदर जो अच्छाइयां थीं, वे एक कमजोरी के आगे छिप गईं और उनकी छवि बदल गई।


नकारात्मक ऊर्जा हमेशा से ताकतवर रही है,मौका पड़ने पर वह बडे से बडे विनाश को पल में अंजाम दे सकती है।


हम अपने प्रयत्नों से हम सकारात्मक बने रहने का प्रयास करते हैं। घर आने पर अतिथि को विशेष रूप से सजे-संवरे कमरे में बिठाते हैं, लेकिन यदि उनके स्वागत के वक्त कुछ अपमानजनक कार्य हो जाता है, तो सारी तैयारियां पल में बेकार हो जाती हैं।


कमजोरियां आकर्षक होती हैं,कमजोरियों के आकर्षण से हम बच नहीं पाते, इसलिए इनकी गिरफ्त में जल्द आ जाते हैं, वहीं हमारी अच्छाइयों का स्वरूप दूसरों को प्रभावित करने वाला होता है, लेकिन उसमें आकर्षण नहीं होता, इसलिए हम उसे जल्दी नहीं अपनाते।


जैसे- चाट पकौड़े स्वास्थ्य के लिए अच्छे नहीं होते, लेकिन इन्हें पसंद करने वाले इनकी तरफ काफी आकर्षित होते हैं।


अब सवाल उठता है कि हम कैसे अपनी कमजोरियों पर विजय पाएं ?


आत्ममंथन करने और कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करने की इच्छाशक्ति है, तो यह संभव है।हम सबके अंदर कमजोरियां मौजूद होती हैं और इसकी कमान होती है सिर्फ हमारे ही हाथ में।